डिजिटल एसेट्स के साथ संस्थागत जुड़ाव अब एक जैसे पैटर्न की स्टोरी नहीं रही है। पिछले कुछ सालों में, बड़े फाइनेंशियल संस्थानों ने ब्लॉकचेन-बेस्ड मार्केट्स के लिए डिजिटल एसेट्स के साथ संस्थागत जुड़ाव अब एक जैसे पैटर्न की स्टोरी नहीं रही है। पिछले कुछ सालों में, बड़े फाइनेंशियल संस्थानों ने ब्लॉकचेन-बेस्ड मार्केट्स के लिए

अलग-अलग रफ्तार, अलग-अलग मकसद: Talos के Samar Sen बता रहे इंस्टीट्यूशंस डिजिटल एसेट्स को कैसे अपनाते हैं

2026/03/02 23:00
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डिजिटल एसेट्स के साथ संस्थागत जुड़ाव अब एक जैसे पैटर्न की स्टोरी नहीं रही है। पिछले कुछ सालों में, बड़े फाइनेंशियल संस्थानों ने ब्लॉकचेन-बेस्ड मार्केट्स के लिए अलग-अलग अप्रोच अपनाई हैं। कुछ ने टोकनाइजेशन पर फोकस किया है, जिसमें ट्रेडिशनल इंस्ट्रूमेंट्स को प्रोग्रामेबल रूप में लाया गया है। वहीं, कई बैंक tokenized deposit मॉडल्स और इंटरनल सेटलमेंट रेल्स के साथ-साथ अपने खुद के डिजिटल एसेट्स जैसे stablecoins इश्यू भी कर चुके हैं।

डिजिटल एसेट्स मार्केट में बढ़ती institutional capital के चलते अब असली सवाल ये है कि कौन हिस्सा ले रहा है, ये नहीं, बल्कि ये कि इंस्टीट्यूशन के अंदर participation को कैसे गवर्न किया जा रहा है। रेग्युलेटरी रिक्वायरमेंट्स, ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स और इंटरनल conviction ये तय करते हैं कि कोई स्ट्रैटेजी आगे बढ़ेगी या वहीं रुक जाएगी।

BeInCrypto से एक्सक्लूसिव बातचीत में, Liquidity Summit 2026 हांगकांग में, Talos के Head of International Markets Samar Sen ने बताया कि जब इंस्टीट्यूशन डिजिटल एसेट्स के अवसरों का मूल्यांकन करते हैं, तो इंटरनल डायनेमिक्स का क्या रोल होता है।

एडॉप्शन के लिए सिर्फ नियम काफी नहीं

Sen के मुताबिक, रेग्युलेटरी क्लैरिटी ही संस्थागत भागीदारी का सबसे बड़ा फैक्टर है। उन्होंने बताया कि विभिन्न देशों में इस फील्ड में प्रोग्रेस हुई है जिससे अनिश्चितता कम हुई है, लेकिन बड़े स्तर की एडॉप्शन के लिए क्लियर रूल्स जरूरी हैं।

Sen ने स्वीकार किया, “हमने दुनिया भर में रेग्युलेशन में काफी तरक्की देखी है।”

पहले जहां इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ी चिंता थी, वहीं अब यह काफी mature हो चुका है। इंस्टीट्यूशनल-ग्रेड कस्टडी, execution प्लेटफॉर्म्स और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सिस्टम्स अब अधिकांश बड़े मार्केट्स में चलन में हैं, जिससे पहले एडॉप्शन में जो operational gaps थे, वो अब काफी हद तक सुलझ गए हैं।

इसके बावजूद, जहां रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क्स में advancement है और infrastructure भी तैयार है, वहां भी कई बार इंस्टीट्यूशन के अंदर ही अड़चन रह जाती है। Sen ने बताया:

यह झिझक आमतौर पर अनभिज्ञता की वजह से होती है, न कि खुले विरोध की वजह से। दशकों की परंपरा पर खड़े institutitons को conviction पाने में समय लगता है। इसी वजह से, एक्सटर्नल कंडीशन्स फेवर करने के बावजूद, digital asset इनिशिएटिव्स कई बार अटक जाते हैं।

Institutional Trust के पीछे की कंप्लायंस चेकलिस्ट

जब Sen से पूछा गया कि कौन से संकेत institutions के लिए crypto counterparties पर ट्रस्ट बनाने में ज्यादा अहम हैं, तो उन्होंने सिर्फ visibility पर निर्भर रहने के विचार को गलत बताया। उन्होंने माना कि इंडस्ट्री गैदरिंग्स और ब्रांड प्रेजेंस अवेयरनेस के लिए जरूरी हैं, लेकिन असली इंस्टीट्यूशनल ट्रस्ट अलग तरीके से बनता है।

Sen ने कहा, “आमतौर पर, सबसे पहले ट्रस्ट वही entities बनाती हैं, जो अपने jurisdiction में licensed या regulated होती हैं।”

इसके अलावा, इंस्टीट्यूशंस ऐसे internal controls पर भी ध्यान देते हैं, जैसे SOC 2 Type II सर्टिफिकेशन, ऑडिट ट्रेल्स और ऑपरेशनल सेफगार्ड्स। ट्रैक रिकॉर्ड भी मायने रखता है, खासतौर पर जब लीडरशिप को ट्रेडिशनल फाइनेंस में अनुभव हो और regulatory scrutiny के तहत लगातार डिलीवरी की reputation हो।

Peer एडॉप्शन भी एक अहम फैक्टर है। संस्थाएं अक्सर ये भी देखती हैं कि कौन-कौन सा peer या competitor वही infrastructure इस्तेमाल कर रहा है और इंडस्ट्री में उसका एडॉप्शन कितना बड़ा है। इस बारे में उन्होंने कहा:

हर institution एक जैसी speed से आगे नहीं बढ़ती

हालांकि रेग्युलेटरी स्पष्टता और ऑपरेशनल सेफगार्ड्स नींव बनाते हैं, लेकिन संस्थान डीजिटल एसेट्स को एकसमान तरीके से नहीं अपना रहे हैं। Sen ने मार्केट में उभरती तीन अलग-अलग प्रोफाइल्स का जिक्र किया।

कुछ ऑर्गेनाइजेशन शुरूआती मूवर्स की तरह एक्ट करते हैं। ये फर्म्स कैपिटल मार्केट्स में चल रहे स्ट्रक्चरल बदलाव को समझती हैं और पूरी स्पष्टता से पहले ही रिसोर्स कमिट करने को तैयार रहती हैं। ये आमतौर पर इंटरनल डीजिटल एसेट टीम्स बनाती हैं और नए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स के साथ प्रैक्टिव तरीके से जुड़ती हैं।

कुछ अन्य ज्यादा संतुलित अप्रोच रखते हैं। ये फास्ट फॉलोअर्स क्लियर रेग्युलेटरी डायरेक्शन या प्रूफ़ ऑफ कॉन्सेप्ट का इंतजार करते हैं, उसके बाद ही एक्सपोजर को स्केल करते हैं। इनकी रिस्क लेने की क्षमता कम होती है और ये अकसर कैपिटल कमिट करने से पहले एक्सटर्नल वेलिडेशन पर निर्भर रहते हैं।

इसके बाद कुछ संस्थान हैं जो अभी भी करंट मार्केट ट्रेंड से पीछे हैं। कभी-कभी लीडरशिप को अभी तकनीक की अंडरलाइंग वैल्यू पर भरोसा नहीं है। कुछ मामलों में डिजिटल एसेट इनिशिएटिव्स तो होते हैं, लेकिन इंटरनल कोऑर्डिनेशन की कमी के कारण स्ट्रैटेजीज़ बिखरी या मिसअलाइंड नजर आती हैं।

Sen ने कहा कि सभी संस्थानों से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे एक साथ मूव करें। उन्होंने बताया कि अलग-अलग रिस्क टोलरेंस और इंटरनल मैंडेट्स से एडॉप्शन की गति तय होती है।

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